Tuesday, August 28, 2012

हसरतों का 'मीना बाज़ार'



कभी देखा है-
हसरतों का 'मीना बाज़ार' ?
मैंने गढ़ रखा है 
बड़ा विशाल सा
अधूरी हसरतों का 'मीनाबज़ार' |
यहाँ सब मिलेंगी 

नन्ही हसरतें ....
युवा हसरतें .....
बूढी चरमराती हसरतें ....

वो देखो---
मेरी नन्ही हसरत ,
बड़े बिजली के झूले में
पींगे भर रही है...
और
वो मौत का कुआँ देखा ?
खतरनाक खेल...
जान हथेली पर रखी हुई ,
मेरी युवा हसरत
हिचकोले खा रही है ...
अब
बुढा गयी हैं
हड्डियाँ भी और हसरतें भी
ऊँची पींगे
नहीं भर सकतीं ....
ना ही खतरों का
सामना कर सकती हैं ,
पर
हसरतें तो हैं और रहेंगी...
भले टूटती , बिखरती ,
चरमराती कियूं ना हो ...
आखिरी श्वास तक
सिरहाने पड़ी रहती है
कोई अधूरी हसरत !!!

रिया 

Tuesday, August 21, 2012

अधूरी हसरत




बहुत छोटी थी वो 
हसरतें थी बड़ी शायद 
मांगती थी चांदनी 
पिताजी बहला देते थे खिलोनो से .....
फिर क्या ...
चांदनी में निहारती थी खिलोनो को 

संभलने लगी जब
समझने लगी जब
जी चाहा सारा जग घूम ले
अम्मा ने चूल्हा चौका दिखा दिया ....
हुई वो जवान
पींगे भरने लगे थे अरमान
हसरतों ने दामन में
एक और सितारा टांक दिया
मांग बैठी वो राजकुमार
तो ब्याह करा दिया ....
छोड़ आई अपनों को
अनजानों को अपना लिया
अपनी हसरतो की चुनर ला
पिया के आगे पसार दिया
अब तक अध टंके सितारों वाली चुनर
पसरी है ....
अब तो सितारों की चमक भी नहीं रही
सिर्फ चुभन रह गयी ....
अधूरी हसरतों की चुभन....
रिया ..

Friday, August 3, 2012

रक्षा बंधन



साल भर से रहता इंतज़ार 
जिस दिन का बहनों को 
भाईयों पे लुटाने को प्यार 
ऐसा सुख देता है ये 
रक्षा बंधन का त्यौहार

सुबह सवेरा सज धज के 
आरती का थाल सजाये 
भाई की राह देखती बहना 
कब आ कर वो डोर बंधाये 
बहना बैठी आस लगाये 
कब भईया पे प्यार लुटाये 

सुबह से वो भूखी बैठी 
कभी थाल निहारे कभी 
वो रस्ता देखे.....
कब आएंगे प्यारे भईया 
खिल उठता मुरझाया चेहरा 
जैसे ही दिखते  उसके  भईया 

बस भैया ना अब देर लगा 
हल्दी कुमकुम चन्दन लगा
जल्दी से अब कलाई बढ़ा
हाथों में बहना का प्यार सजा 
बहना को स्नेहयुक्त गले लगाके 
भैया ने भी किये  कुछ वादे 

प्यारी बहना तू ना डरना 
कोई हो मुश्किल मुझसे कहना 
युग युग से है यही हुआ 
हर बहना की है  दुआ 
गवाह बना है सम्पूर्ण संसार
सदा सलामत रहे ये प्यार 

रिया 

सावन, मैं और भीगे रास्ते



सावन, मैं और भीगे रास्ते



सीने में 
जलन की ज्वाला
द्वेष की तपिश 
अहम् की अग्नि
स्वाभिमान की ऊष्मा 
लिए निकल पड़ी...
सावन के भीगे 
रास्तों पर .....
पानी की बौछारों से
ज्वाला फूट फूट 
भड़कने लगी
तपिश सूक्ष्म और
अग्नि धुंआ हो के 
छूटने लगी देह से
जैसे विसर्जित हो रही 
कोई शापित काया नेह से
धुल गये सारे 
दुःख विषाद
प्रवाहित जल धारा में  
पवित्र भीगे चोले में 
अब बची बस 
उन्मादित , निरविकार
स्वच्छ ,निर्मल, पारदर्शी 
मेरी अंतर आत्मा...
जो देख सकती थी 
अपने दिव्य तेज से
सांसारिक कोहरा 
जटिल जीवन के बवंडर
और उन से लथपथ 
मेरी काया ....
कुछ पल यूँ ही भीगे 
रहना चाहती हूँ 
महशूस करना चाहती हूँ
इस शीतलता को
डूब जाना चाहती हूँ 
उन्माद की गहराईयों में 
इससे पहले की  
चोला  बदल जाये ----

रिया

Friday, June 22, 2012



आओ प्रियवर 


आओ प्रियवर , तुझे मैं
एक ऐसे जहां ले चलूँ .......

जहाँ हवा में सुकून हो 
फूलों  में  खुशबू,
दिलों में धड़कन,
और फिजा में जुनून हो
कहोगे जो तुम तो ,मैं
ख़ुशी का कारवां ले चलूँ.......

आओ प्रियवर , तुझे मैं
एक ऐसे जहां ले चलूँ .......

जहाँ शीतल जल धारा हो 
हर आलम दिलकश प्यारा हो
पल- पल  , क्षण -क्षण 
बस मेरा और तुम्हारा हो 
तुम ही कहो ना , मैं 
कहाँ ले चलूँ ............... ?

आओ प्रियवर , तुझे मैं
एक ऐसे जहां ले चलूँ .......

जहाँ वादियों का रूप संवारता हो
जीवन नित नव राग भरता हो
दिल यादों की पींगे भरता 
निश्छल प्रेम अर्पण करता हो
कहो तो मैं तुझे 
वहां ले चलूँ...... ?

आओ प्रियवर , तुझे मैं
एक ऐसे जहां ले चलूँ .......

जहां प्रेम,स्नेह प्रणय का पहर हो
स्वपन सुसज्जित घर हो
ना आंधी , ना तूफां
ना जमाने का डर हो
चलो मैं तुझे ,
उसकी पनाह ले चलूँ.....

आओ प्रियवर , तुझे मैं
एक ऐसे जहां ले चलूँ .......

जहां रक्त रंगित सुमन होगा 
प्रेम आलिंगन  मधुबन होगा 
त्याग कर देहों का बंधन 
मोह माया का स्पंदन ...
चलो मेरे संग प्रियवर 
मैं आत्मा ले चलूँ .....

आओ प्रियवर , तुझे मैं
एक ऐसे जहां ले चलूँ .......

रिया 



 तुझे ढुंढने आ रही 




जाने कियुं ???
आज रात बेहद 
काली, घनी, डरावनी   
खौफनाक सी लग रही ...

चांद तो निकला है 
साथ चलने को ,
पर घटाओं का 
आधिपत्य है उस पर ....

तारे भी टिम - टीमाने
आए पर ,
बादलों का छत्र 
है उन पर .....

अन्धेरे की चादर ओढे 
किसी डगर पे जा रही ,
डरी , सहमी, काँपती सी 
अपने कदम बढा रही 

ढुंढ ले ओ साजन मेरे
मैं तुझे ढुंढने आ रही,
महक तुम्हारे साँसों की 
हर पल मुझे महका रही...

खुश्बू से ही
ढुंढ ले शायद ,
खुश्बू अपनी रूह की 
मैं बिखेरती जा रही ......

ढुंढ ले ओ साजन मेरे
मैं तुझे ढुंढने आ रही ||

रिया




आखिर कियुं??


हाद्सों  पे हाद्से होते रहे....
हम अपने अपनो को खोते रहे ...
वो आतंक का बीज बोते रहे ....
देश के चालक सोते रहे....

उठो जागो अपने लिए
अब देश को तुम ही बचाओगे
भरोसा किया अगर फिर उन पे 
तो निःसन्देह फिर धोखा खाओगे

वही हाड़ वही मांस से बना
वही माँ की कोख से जना
आखिर आतंकी भी तो मानव है
फिर कियुं प्रवृति से दानव है?

घर उजाड़ के  लहू बहाना, 
कियुं उसका स्वभाव है?
लगता है स्नेह प्यार दुलार का
जीवन मे उसके अभाव है ...

ये पैगाम है उन हत्यारों को
मत ललकारो वतन के प्यारो को
गर वो मैदान पे आ गए 
नस्तेनाबूत कर देंगे गुनाह्गारो को

आखिर ......
कियुं ये  दहसत,खून खराबा
अमन चैन कियुं नही भाता ?
दुश्मन बन के आते हो ....
भाई बन कियुं नही आता ??

:( रिया